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गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों नदियाँ

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गुल्शन है जिनके दम से रश्क-ए-जनाँ हमारा

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ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वह दिन हैं याद तुझको?

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उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा

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मज़्हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

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हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा

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यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गए जहाँ से

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अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा

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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा

 

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इक़्बाल! कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
 

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मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा!

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